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शनिवार, 3 मार्च 2012

कबीर माला  काठ  की , कहीं समझावे  तोही
मन ना फिरावे  आपना , कहा   फिरावे  मोहि


अनुवाद : कबीर, लकड़ी के मोतियों से  बनी ये  माला  , क्या तुम्हे  सिखा सकती  हैं?
                       यदि तुम्हे अपने मन की गति पर ही नियंत्रण नहीं है, तो मोती की गति का नियंत्रण क्यों?

अर्थ      :मोती नहीं मन पर नियंत्रण रखो.

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