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रविवार, 22 अप्रैल 2012

मेरे दर्द की दवा आज कोई मेरे सनम करदे

मेरे दर्द की दवा आज कोई मेरे सनम करदे,
थोडा मुस्करा के मेरे गम को कम करदे |

तेरी मेहरबानी मुझपे सनम अगर हो जाये ,
मेरे लिए आसान जिन्दगी की डगर हो जाये ,
कट जायेगा सफ़र जिन्दगी का तू अगर मेरे क़दमों के संग कदम धरदे |

बिना तेरे साथी जिन्दगी मेरी अधूरी सी है,
जिन्दा है लेकिन सांसों से दुरी सी है,
मुदत्तों से मुर्दा पड़े इस जिस्म में थोडा सा दम भरदे|

यादों के साये आज मेरे चारोँ और घूमते है ,
तेरी जुल्फों के के बादल आज भी मेरे सीने को चुमते है ,
तेरी इन मद मस्त आँखों की मस्ती को मेरे जख्मों का मरहम करदे |

साथ जो मिले गर तुम्हारा मेरी जिन्दगी सवार जाये,
तुझको पाकर मेरा जीवन खुशियों से भर जाये ,
भुला के आज ये सारे गम आँखे मेरी ख़ुशी से नाम करदे |

दर्द ए जुदाई अब और नही सह सकेंगे,
तेरे सिवा और किसी से न कह सकेंगे ,
आ जाओ इससे पहले पहले की की मौत मुझे बेदम करदे |

ये दिल तुम बिन दर्दो गम से आहें भरेगा ,
जख्मी दिल की दवा तुम बिन कौन करेगा ,
"नामदेव" पे रहम तू थोडा आज सनम कर दे ||

रविवार, 15 अप्रैल 2012

बात उन दिनों की है

बात उन दिनों की है जब लोगों के पास मोबाइल फोन नहीं हुआ करते थे.
 संता की बीबी अस्पताल में भर्ती थी.
 उसे बच्चा होने वाला था. चूंकि संता को बहुत जरूरी काम से ऑफिस जाना था 
इसलिए उसने कुछ पैसे देकर एक नर्स को मनाया
और अपने ऑफिस का नंबर देकर उससे कहा -”जैसे ही मेरी बीवी को बच्चा पैदा हो
 मुझे फ़ौरन फोन कर के बता देना. फोन मेरे बॉस के पास रहता है 
इसलिए तुम्हे कोडवर्ड में बात करनी होगी. यदि लड़का हो तो कहना कि मैं पास हो गया.
 और यदि लड़की हो तो कहना कि फ़ैल हो गया… ठीक है ?
नर्स के मुंह से हाँ सुनकर संता ऑफिस चला गया. लगभग 2 घंटे बाद 
उसके बॉस ने उसे अपने केबिन में बुलाया और कहा –
 “तुम्हारे लिए किसी औरत का फोन आया था. 
वह शायद तुम्हारे किसी रिजल्ट के बारे में बता रही थी … 
 हाँ हाँ सर, रिजल्ट…. क्या रिजल्ट बताया उसने ?” – संता ने उत्सुकता से पूछा.>
तुम्हारी सप्लीमेंट्री (पूरक) आई है.” – बॉस ने जवाब दिया

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

माँ की ममता और फर्ज बाप का
दुनिया में सब पे भारी है
बेटी नाम दुलार का है
नाम समर्पण का नारी है

भाई सा सच्चा साथी दुनिया में कोई और नहीं .
सच्चे यार की वफ़ा जैसा दुनिया में कोई और नहीं ..
बहन है सच्ची रक्षक दुःख सुख की संगी है

दादा परिवार की नीव जिस पर परिवार की ईमारत खड़ी है
दादी ठंडी छाव् बनके सर के ऊपर छत सी पड़ी है
ये दोनों है आने वाले कल प्रेरणा
बिना इनके जिन्दगी बे रंगी है

बेटे है जमा पूंजी जो काम वक़्त पे आये
जवानी का गौरव है बेटे और बुढ़ापे की लाठी है
बिना बेटे के बाप की जिंदगी ही बे ढंगी है

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

दर्द ज़माने का पाया मैंने तुमसे दिल लगा के

जाने क्या खोया क्या पाया मैंने तुमसे दिल लगा के
नींद आँखों की खोयी ,दर्द ज़माने का पाया मैंने तुमसे दिल लगा के

आँखों में नींद का नाम नहीं.
दिल में चैन का काम नहीं ..
बेदर्द ज़माने में जज्बातों का कोई दाम नहीं ...
जाने कौन सा दर्द जगाया मैंने तुमसे दिल लगा के
जाने क्या खोया क्या पाया मैंने तुमसे दिल लगा के
नींद आँखों की खोयी ,दर्द ज़माने का पाया मैंने तुमसे दिल लगा के

... दिल को सुकून मिले ना मिले .
आँखों को चैन मिले न मिले ..
जख्म दिल के सिले न सिले ...
फिर भी जाने क्यू हर वकत जख्मों को सहलाया मैंने तुम से दिल लगाके
जाने क्या खोया क्या पाया मैंने तुमसे दिल लगा के
नींद आँखों की खोयी ,दर्द ज़माने का पाया मैंने तुमसे दिल लगा के

सोचा था उनसे मिलकर थोडा सा चैन मिले.
वो जब भी मिले मुझसे हर वक़्त बेचैन मिले ..
दिल के सारे जख्म ही मुझे उनकी ही देन मिले...
दर्द ज़माने कम पड़ गया जितना पाया मैंने तुझसे दिल लगा के

जाने क्या खोया क्या पाया मैंने तुमसे दिल लगा के
नींद आँखों की खोयी ,दर्द ज़माने का पाया मैंने तुमसे दिल लगा के

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

भ्रम में आकर आदमी तमाम तरह की आदतों का शिकार हो जाता है

संपति भरम गंवाइ के, हाथ रहत कछु नाहिं

ज्यों रहीम ससि रहत है, दिवस अकासहिं मांहि।।6।।

अर्थ: कविवर रहीम कहते हैं कि भ्रम में आकर आदमी तमाम तरह की आदतों का शिकार हो जाता है और उसमें अपनी संपत्ति का अपव्यय करता रहता है और एक दिन ऐसा आ जाता है जब उसके पास कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसके साथ ही समाज में उसकी प्रतिष्ठा खत्म हो जाती है।