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शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

भ्रम में आकर आदमी तमाम तरह की आदतों का शिकार हो जाता है

संपति भरम गंवाइ के, हाथ रहत कछु नाहिं

ज्यों रहीम ससि रहत है, दिवस अकासहिं मांहि।।6।।

अर्थ: कविवर रहीम कहते हैं कि भ्रम में आकर आदमी तमाम तरह की आदतों का शिकार हो जाता है और उसमें अपनी संपत्ति का अपव्यय करता रहता है और एक दिन ऐसा आ जाता है जब उसके पास कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसके साथ ही समाज में उसकी प्रतिष्ठा खत्म हो जाती है।

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